जुलाई २५, २०२६
ओम नमः शिवाय
आज का सुविचार 🙏🙏
# ३०७९
हो रही थी शाम…
हो रही थी शाम
ख़त्म कर दिनचर्या के काम
आया जन बैठने गुरुजी के पास
था कुछ कुछ सहमा, और थोड़ा उदास।
उसने माथा टेका
फिर गुरुजी को देखा
उसने गुरुजी से कुछ कहना चाहा तब
गुरुजी ने उसे वहीं रोक दिया तब
और उस से कहा कि वे जानते हैं सब
और वे सुधारेंगे सब सही समय आयेगा जब।
जन की आँखों में तसल्ली के आँसू आए
उसके लब मुस्कुराए
बिन किए कोई अगर मगर
उसने आज्ञा लेकर जारी रखा सफ़र
रखता चला श्रद्धा और सबर
कई वर्ष गए गुज़र।
धीरे धीरे हालात सुधरते गए
सिमरन से मनोबल के धागे मज़बूत हुए
गुरुजी दिखाते चले उसे राह
बख़्शते हुए हर दिन नया उत्साह।
गुरुजी की भक्ति में मगन
जन गुज़ारता गया जीवन
कर के हर कर्म गुरुजी को अर्पण
गुरुजी से जोड़े हुए मन।
कारज आए रास
भीतर बढ़ता गया उल्लास
गुरुजी के मिलन का इच्छुक
जन बना उनके चरणों में भिक्षुक।
गुरुजी करते रहे जन का कल्याण
जन भी गुरुजी को हाज़िर नाज़िर मान
गुरुजी को देकर अपना सर्वस्व भरा मान
करता रहा उनके नाम अमृत का पान।
गुरुजी ने बनाया उसे अपना गण
गुरुजी के नूर से उजला हुआ उसके अंतस का दर्पण
हर सुबह, हर शाम हुई सुंदर
गुरुजी का वास जो था सदा उसके भीतर।
जैसे जन का हुआ उद्धार
सारी संगत का हो बेड़ा पार
सभी का हो गुरुजी से निस्वार्थ प्यार
सभी को मिले गुरुजी का प्यार बेशुमार।
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जय गुरुजी 🙏🙏
धीरजा
हो रही थी शाम… (07/24/2026)