सितंबर ६, २०२६
ओम नमः शिवाय
आज का सुविचार 🙏🙏
# ३१२२
मेरे परम पिता पूरण गुरु
ना जागी थी ना सोयी
गुरुजी के ख़यालों में थी खोयी
गुरुजी से हो रही थी बात
ना जानूँ दिन था या थी रात
है याद कि मैं थी गुरुजी के साथ
मेरे सिर पर था उनका हाथ
इस रूहानी अनुभव में आनंद आ रहा था
दिल इतना सुकून पा रहा था
मन गुरुजी का गुणगान गा रहा था
और साथ ही मुस्कुरा रहा था।
गुरुजी की रूहानी खुशबू के सिंधु में
डूब कर तर रहा था मेरा हर श्वास
गुरुजी की दृष्टि थी मुझ नाचीज़ पर
ये एहसास था इतना अनमोल और खास।
गुरुजी के दिव्य नूर के तेज से
रोशन हो रहा था वह स्थान
गुरुजी ने मुझे अपने चरण का स्पर्श करने दिया
ये भी था उनकी दया का दान।
गुरुजी की मेहर से चरणोदक जो मिला
मेरा चेहरा और मेरा हृदय खिला
गुरुजी भी इतने प्रेम से मुस्कुराए
कि मेरे नेत्रों में दीन भाव के अश्रु आए।
तभी मेरे अंतस की आँखों के समक्ष
अलौकिक उजाला दिखा प्रत्यक्ष
और मैंने स्वयं को बैठक में पाया
जहाँ पर गुरुजी में ध्यान था लगाया।
गुरुजी का शुक्राना कर के
मैं उठी करने दिनचर्या शुरू
सदाशिव के स्वरूप हैं
मेरे परम पिता पूरण गुरु।
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जय गुरुजी 🙏🙏
धीरजा
मेरे परम पिता पूरण गुरु (09/06/2026)