ितंबर १५, २०२६
ओम नमः शिवाय
आज का सुविचार 🙏🙏
# ३१३०
गुरुजी आए दासी के पास
लगाए हुए दिल से आस
कि गुरुजी आयेंगे उसके पास
इक दासी कर रही थी तैयारी उनके आगमन की
सजावट की उसने गुरुजी के लिए आसन की।
लाल शनील के वस्त्र से
आसन को उसने सजाया
सुनहरा दुपट्टा गुरुजी के लिए रखा वहाँ
तैयारी में वक़्त ना जाने गया कहाँ।
अपने दिल की बगिया से
वह प्रेम के फूल तोड़ कर लायी
आसान के आसपास उन्हें बिछाने पर
वह ख़ुद भी फूली ना समायी।
दीप में डाला श्रद्धा का घी
गुरु चरणों के लिए बिछाया मख़मल भी
साथ में पंख मोर के
फिर देखने लगी दरवाज़ा ग़ौर से।
मन की ज्योत जलाई उसने
फिर गुरुजी को प्यार से पुकारा
महाराज तो करुणानिधान हैं
देने आए दासी को सहारा।
दासी ने गुरुजी के आने पर
सराहा अपना नसीब और घर
परात में जल वह आई लेकर
गुरुजी आसन की ओर आए उसका हाथ पकड़कर।
गुरुजी की यह इनायत
सपना था या हकीकत
दासी को आ ना रहा था समझ
फिर धीरे धीरे विश्वास से भाव गया सुलझ।
गुरुजी की दिव्य ख़ुशबू से
महक रहा था वातावरण
गुरुजी को आदर से आसन पर बैठाकर
दासी ने धोए उनके चरण।
गुरुजी ने उसे चरणोदक पीने के लिए कहा
दासी ने शुक्राना कहा और किया उस अमृत का पान
अमृत भीतर जा रहा था
आँख में अश्रु आ रहा था
गुरुजी तो समझ गए थे सब
एक अकल्पनीय रूहानी अनुभव हुआ तब।
गुरुजी का चेहरा हुआ लाल
दासी के मन में उठे सवाल
मानो गुरुजी कर रहे थे मन में कोई पाठ
फिर उन्होंने अपने पीछे की ओर किया अपना हाथ
अचानक प्रकट किया उन्होंने
सचखंड का कढ़ा प्रसाद
बुलाया दासी को अपने पास
देने अपना आशीर्वाद।
दासी तो थी आश्चर्यचकित और भावविभोर
दीन भाव से देखा उसने गुरुजी की ओर
खड़ी हुई जाकर गुरुजी के समक्ष
देख रही थी अपने रब को प्रत्यक्ष
गुरुजी ने दिया उसे वह प्रसाद और पूरा खाने के लिए कह दिया
दासी ने हुक्म माना और उस प्रसाद का गर्म सेक भी सह लिया।
गुरुजी उसे देखकर मुस्कुराए
इस से पहले कि दासी कुछ कह पाये
गुरुजी ने उसे अपने चरणों में बैठाकर
उसके सिर पर फेरा अपना हाथ
और कहा दासी से कि वे सदा सदा ही
रहेंगे उसके साथ।
फिर वे उठ गए अचानक से
और दासी ने छुए उनके चरण
गुरुजी हो गए अंतर्धान
देकर दासी को अपने सानिध्य का वरदान।
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जय गुरुजी 🙏🙏
धीरजा
गुरुजी आए दासी के पास (09/14/2026)