अप्रैल २७, २०२६
ओम नमः शिवाय
आज का सुविचार 🙏🙏
# २९९०
मैं भी हूँ मुसाफ़िर
मैं भी हूँ मुसाफ़िर, और मुसाफ़िर ही हो तुम
हर मुसाफ़िर समय के चक्र में कभी ना कभी होता है गुम
पर सोचता है अक्सर या कभी कभी
कि वो जानता है सभी
और इस भ्रम में गुज़ारता है सफ़र
फिर जब रास्ता नहीं आता नज़र
तो भटकने लगता है
तड़पने लगता है
जाता है जान अपना ही अज्ञान
और जब होती है अज्ञानता की पहचान
तो फिर ढूँढने लगता है पथ
और उस पथ पर अपनी पत
लेकिन देख पाता है केवल अंधकार
और महसूस करता है लाचार।
और जिस मुसाफ़िर का सफ़र होता है गुरु के सहारे
मुश्किल के बावजूद भी उसके हो जाते हैं वारे न्यारे
गुरु की दिव्य ज्योत उस मुसाफ़िर के पथ का अंधकार करती है दूर
और कर के उसके हर अहम और भ्रम को चूर
उसे अवगत कराती है उसकी खामियों से
और वाक़िफ़ होते हुए उसकी परेशानियों से
गुरु करते हैं मुसाफ़िर का मार्गदर्शन
और कर के उसके अंतस का पवित्रीकरण
बनाकर उसे पात्र अपनी कृपा और मेहरबानी का
संवारते हैं रूप उसकी ज़िंदगानी की कहानी का।
शुक्र है तुम और मैं हैं गुरुजी महाराज की शरण में
भाग्यशाली हम जो उन्होंने बुलाया अपने चरण में
उनसे है ये विनम्र अरदास
की सदा रखें हमें अपने पास
अपनी रहमत से हमें अपनी कृपा का पात्र बनायें
और सभी पर सदा अपनी दयादृष्टि बरसायें।
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जय गुरुजी 🙏🙏
धीरजा
मैं भी हूँ मुसाफ़िर (04/27/2026)