राही का सफ़र (04/28/2026)

अप्रैल २८, २०२६

ओम नमः शिवाय
आज का सुविचार 🙏🙏

# २९९१

                         राही का सफ़र

कई साल गए गुज़र
यूँ चल रहा था राही का सफ़र
कि उसे अकेला सा महसूस होता था
भीड़ में भी अकेलेपन से रोता था
लगता था उसे कि तमाशा है संसार
लगता था उसे कि कहीं और है असल ख़ुशी का द्वार
ना आता था उसे लोगों का व्यवहार समझ
तो जाता था और भी उलझ।

फिर गुरुजी की कृपा हुई उसपर
गुरुजी ने उसपर डाली अपनी मेहर-ए-नज़र
क्यों उसे दुनिया वाले ना लगते थे अपने, गुरुजी ने उसे समझाया
गुरुजी संग रूहानी तार जोड़कर उसने अपने सवालों का जवाब पाया।

ये जाना उसने
ये माना उसने
कि चाहे निस्वार्थ हो या स्वार्थी
सभी की होती है अपनी ही कार्यावली
प्यार सोच कर मोह जताया जाता है अक्सर
दुनिया है बाज़ार और जाने अनजाने में भावनाओं का भी व्यापार होता है अक्सर
वो भी था व्यापार जिसे राही समझ रहा था प्यार
सोचा उसने की क्या ऐसा ही होता है संसार?
जाना उसने की कोई बुरा नहीं, बस, सभी हैं अलग
बाहरी आडंबर को ही कहते हैं जग।

राही गुरुजी संग तार जोड़ पाया
गुरुजी ने उसे ऊँची अवस्था पर पहुँचाया
जागृत होकर उसने लिया निर्णय
इसलिए नहीं था कोई संशय
फैसला किया सभी को मन से छोड़ देने का
सभी से मोह के बंधन को तोड़ देने का।

केवल दूसरों से मुंह मोड़ने के लिए नहीं
बल्कि स्वयं के भीतर लौटने के लिए
अपनी चेतना से हुई दोबारा पहचान
उसने चेतना को आखिरकार अपना लिया मान।

भीड़ में दूजों के साथ दिल मिलाने के बजाये
उसने पा लिया था अपने भीतर गुरुजी से दिल मिलाने का उपाय
जो दिल टूट जाता था बार बार
दूजों के झूठ और नियंत्रण से
उसी दिल ने हर कमज़ोरी कर ली पार
सकारात्मक परिवर्तन से।

उसने बदली अपनी धारणाएं भी
रूहानी उन्नति की ओर केंद्रित किए विचार सभी
अब दबा ना पाता उसे दूजों का अभिमान
गुरुजी की दया और कृपा से खिला उसका आत्मा-सम्मान।

नीवेंपन की नींव पर बनती चली इबादत की इमारत
मोह छूटा तो छोटी दूजों के प्रति शिकायत
राही ने छोड़ा दूजों को मनाना
शुरू किया उसने अपनी बिगड़ी को बनाना।

जो राज़ी नही था रिश्ता निभाना सत्य के साथ
उसके मन ने छोड़ दिया थामना उनका हाथ
जितना हुआ दुनिया वालों के शोषण और उपयोग से दूर
उतना ही उसके भीतर और चेहरे पर छाया गुरुजी का नूर।

इस नूर ने किया राही की राहों को उज्जवल
गुरुजी की याद में रहने लगा वो हर पल
उसे समझ आया कि उसे लगता था दूसरों के संग रहना ज़रूरी
क्यूँकि उसकी स्वयं से थी बहुत ही बड़ी दूरी
जैसे जैसे गुरुजी को चेतने लगा उसका चित्त
वो दूरी गई मिट।

अब जो उसने निरंतर गुरुजी का सानिध्य पाया
तो राही ने स्वयं को सम्पूर्ण पाया
गुरुजी में अपने आप को खो कर
गुरुजी, बस गुरुजी का हो कर।

🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

जय गुरुजी 🙏🙏
धीरजा

राही का सफ़र (04/28/2026)

Leave a comment