जुलाई १६, २०२६
ओम नमः शिवाय
आज का सुविचार 🙏🙏
# ३०७०
चल रहा था मुसाफ़िर…
चल रहा था मुसाफ़िर
होकर बेख़बर
कि उसे कोई मिलेगा
और उसका नसीब खिलेगा।
उसके जीवन में था इक ख़ालीपन
किसी को ढूँढता था उसका मन
पर वो ना पाता था समझ
जितना सोचता था, जाता था उतना ही उलझ।
गुज़रता रहा समय
अब उसे होने लगा संशय
कि कौन है वो जो है इतना शक्तिमान
जिसके लिए उसका मन हो रहा है यूँ परेशान?
मुसाफ़िर महसूस कर रहा था स्वयं को गुमराह
मिल नहीं रही थी उसे सुलझन वाली कोई राह
फिर उसे सम्भालने आए शहंशाहों के शहंशाह
और मुसाफ़िर के मन में ना रही बाक़ी कोई और चाह।
बैठा था वह इक रात इक जलाशय के किनारे
नाकामयाबी से गिनते हुए आसमान में तारे
हवा चल रही थी मंद मंद
उसकी आँखें होने लगीं बंद
तभी किसी ने उसका सिर छुआ
मुसाफ़िर को बहुत आश्चर्य हुआ।
उसकी आँखों से उसी पल बहने लगे आँसू
उसे लगा कि उस अनजान व्यक्ति ने छू ली उसकी रूह
उसके हाथ जुड़ गए नमस्कार में
उसे लगा दर्शन दिए हैं पर्वरदिगार ने।
सही था उसका ये अनुमान
क्यूँकि उसके समक्ष खड़े थे भगवान
गुरुजी महाराज के रूप में वे लग रहे थे शहंशाह पराक्रमी
मुसाफिर चुप था, लेकिन बोल रही थी उसकी आँखों की नमी।
ये सब सपना है, मुसाफ़िर को लगा
फिर उसे लगा कि वह नींद से जगा
बिन किसी के कुछ बोले हुआ दोनों के बीच वार्तालाप
मुसाफ़िर को लगा कि धुल गए उसके कई जन्मों के पाप।
“कौन हैं आप, जो लागें मुझे इतने महान और शक्तिमान?”
“आपके दर्शन पाकर तो होने लगा है मेरा कल्याण।”
कहा मुसाफ़िर ने गुरुजी महाराज से बहुत प्यार से
“मैं धन्य हो गया आपके दीदार से।”
गुरुजी महाराज ने स्वयं में
मुसाफ़िर को अनेकों देवी देवता के कराये दर्शन
मुसाफ़िर अनुग्रह से झुकता गया
और छू लिए उसने गुरुजी महाराज के चरण।
गुरुजी महाराज हुए अंतर्धान
मुसाफ़िर अब नहीं था परेशान
गुरुजी की महिमा से हुई थी उसकी पहचान
उसने उन्हें अपना आराध्य लिया मान।
गुरुजी की याद से रहा उसका मन आबाद
उसे बड़े मंदिर जाने का मौका मिला बरसों बाद
उसे पहली बार मिला गुरुजी का चाय प्रसाद और लंगर प्रसाद
उसने किया गुरुजी का तहे दिल से धन्यवाद।
गुरुजी मुसाफ़िर पर करते रहे नदर
बिन संशय, बिन उलझन के बीता उसका सफ़र
मुसाफ़िर ने गुरुजी के आशीष के महत्व को जान
उनसे अर्ज़ी की कि वे करें सभी का कल्याण।
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जय गुरुजी 🙏🙏
धीरजा
चल रहा था मुसाफ़िर… (07/16/2026)