अक्तूबर १६, २०२६
ओम नमः शिवाय
आज का सुविचार 🙏🙏
# ३१६२
ख़यालों का ख़ज़ाना
प्रकृति ने बख्शा प्राणियों को इक और नया दिन
नज़ारे थे भिन्न भिन्न
पत्तों पर छायी थी हरियाली
हवा की अदा थी मतवाली
फूल सुगंधित थे महक से
पंछी ख़ुश थे चहक के
निखरा हुआ था पेड़ों का रूप
दिख रही थी मीठी मीठी धूप
आसमान में चल रही थी बादल और सूरज की छुपन छुपायी
पूरे वातावरण में अद्भुत सुंदरता थी समायी।
सैर के लिए घर से निकला जन
किसी उलझन में था उसका मन
मन में चल रहा था गुरुजी का चिंतन
चलते चलते होने लगा गुरुजी के ख़यालों में मगन।
घर के आसपास की सड़कों से
उसने इतने मोड़ ले लिए और उसे पता ना चला
गुरुजी की याद में विलीन था इतना कि दिन गुज़र गया
उसे एहसास हुआ जब सूरज ढला।
लेकिन इतने पल जो उसे मिले गुरुजी के चिंतन के
वे लाए उपाय उसकी उलझन के
गुरुजी ने उसे दिए ऐसे संकेत
जो बन गए मूल उसकी सुलझन के।
जन चलने लगा अपने घर की ओर
अब प्रकृति के नज़ारे थे कुछ और
चाँद दिखने लगा था आसमान में
तारे रहे थे टिमटिमा
देख कर अपने गिरेबान में
उसने अपना सिर दिया झुका।
करते हुए गुरुजी का शुक्राना
घर पहुँचा वह जन दीवाना
उलझन तो शायद बनी इक बहाना
दरअसल एकत्रित किया उसने गुरुजी के ख़यालों का ख़ज़ाना।
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
जय गुरुजी 🙏🙏
धीरजा
ख़यालों का ख़ज़ाना (10/16/2026)