अक्तूबर २७, २०२६
ओम नमः शिवाय
आज का सुविचार 🙏🙏
# ३१७३
सदा उसके अंग संग हैं उसके गुरु
इक राही था अकेला चल रहा
चलते चलते उसके पाँव ने उससे कहा
कि थोड़ा रुक जाये कहीं
राही को दिखी इक बगिया वहीं
बगिया में जाकर वह बैठ गया इक पत्थर का सहारा लेकर
इक तलैया से प्यास बुझायी अपनी अंजलि में पानी लेकर।
बगिया में घास थी गीली और हरी हरी
ओस की बूँदों से वह थी भरी भरी
हर बूंद पर सूरज की चमक यूँ थी चढ़ी
कि हर बूँद की सुंदरता थी बढ़ी।
बेशक उन्हें बनाने वाला था भगवान
पर ओस की बूँदें घास और मिट्टी पर कर रहीं थी एहसान
यह दृश्य था इतना प्यारा
राही ने देखा बूँदों को दोबारा।
ओस की बूँदों को गिन पाना था नामुमकिन सा
राही चुपचाप उन्हें देखता ही रहा
फिर उसे ये ख़याल आया
कि जिसने इन अनगिनत बूँदों को बनाया
उसी ने बनाया है बाक़ी सब
ना जाने वो ये कैसे करता है और कब
राही ने देखा आसमान की ओर और फिर धरती पर
कारणकर्ता के नमन में झुक गया उसका सर।
राही को लगा कि बगिया का हर फूल मुस्कुराया
तभी हवा का इक तेज झोंका आया
अचानक आई राही को गुरुजी की याद
और अगले ही पल उसे एहसास हुआ गुरुजी की रूहानी ख़ुशबू का
वो राही जो पहले से ही भावविभोर हो चुका था
अब तो क्या कहूँ, क्या हाल हुआ उसकी रूह का।
रूह राही की गद्द गड्ड गई हो
राही गुरुजी की ख़ुशबू में गया खो
शुक्राना किया उसने गुरुजी का
जिन्होंने उसे इतना सुंदर अनुभव बख्शा।
अब राही की थकावट मिट चुकी थी
फिर क़ायम हुई उसकी गति जो रुकी थी
धीरे धीरे खुशबू लुप्त हुई हवा के संग
लेकिन चढ़ चुका राही पर गुरुजी की रहमतों का रंग
उसने दोबारा से चलना किया शुरू
जानते हुए कि सदा उसके अंग संग हैं उसके गुरु।
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जय गुरुजी 🙏🙏
धीरजा
सदा उसके अंग संग हैं उसके गुरु (10/27/2026)