कला मानसिक दूरसंचार की (10/20/2026)

अक्तूबर २०, २०२६

ओम नमः शिवाय
आज का सुविचार 🙏🙏

# ३१६६

                                   कला मानसिक दूरसंचार की 

ना कोई भौतिक माध्यम
ना लिखने का कोई साधन
बिन कानों से सुने, बिन मुंह से कहे
इक के मन का भाव दूजे के मन तक बहे।

हराकर हर विकर्षण को
शांत और स्थिर होना होगा मन को
सुननी होगी अपने भीतर की आवाज़
करना होगा इसका निष्ठापूर्ण प्रयास।

सुनते सुनते भीतर की आवाज़
पोषित होगा ऐसी अनुभूति का एहसास
आत्माओं के बीच का परस्पर भाव बोध जिससे बढ़ेगा
जो अपनी पवित्रता के कारण चमकेगा।

गुरुजी से भी इसी प्रकार से
जुड़ी रहे रूहानी तार
होती रहे उनसे बात
चाहे दिन हो या हो रात
या हो उनके स्वप्न दर्शन
गुरुजी से जुड़ाव रहे हर क्षण।

गुरुजी का बख्शा सिमरन और ध्यान
है उपाय इस बोध को निखारने का
धीरे होती चलेगी गति मन के हर विचार की
तो विकसित होगी कला मानसिक दूरसंचार की।

गुरुजी का बेअंत शुक्राना
कि उन्होंने बख्शा है ये रूहानी ख़ज़ाना
आज से भी ज़्यादा इसकी ज़रूरत आने वाले कल में होगी
कुछ ऐसा ही होगा आने वाला ज़माना।

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जय गुरुजी 🙏🙏
धीरजा

कला मानसिक दूरसंचार की (10/20/2026)

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