होना भी अगर चाहो तुम तो हो नहीं सकते किसी के अपने और कोई भी तुम्हारा अपना है ऐसे ख़याल हैं महज़ कुछ सपने।
हकीकत है ये, मान लो तो है अच्छा इक रिश्ते के अलावा कोई रिश्ता नहीं है सच्चा सुच्चा वो रिश्ता है गुरुजी का तुम्हारे साथ इस रिश्ते में है वह बात… जो रूह को छू जाती है जो निर्मल सुकून लाती है रोम रोम में तुम्हारे… और बेशक खड़ी हों लाखों दीवारें गुरुजी देते हैं उन्हें तोड़ ताकि तुम सब कुछ छोड़ उनके ही हो जाते हो उनसे यूँ जुड़ जाते हो जैसे तरुवर से डाली और फूल… और बनकर उनके चरणों की धूल कर देते जो उन्हें स्वयं को अर्पण और उनकी ही याद में रहते हो हर क्षण।
ये गुरुजी की महर से ही होता है कि भक्त इतना उनमें खोता है कि संसार में रहते हुए भी फ़र्ज़ और कर्मों का भार सहते हुए भी उसका ध्यान होता है गुरुजी की ओर और गुरु चरण होते हैं उसकी आरम्भिक और अंतिम छोर।
जिसका गुरुजी की ओर मुख है वह जाने की गुरुजी के चरणों में हर सुख है गुरु चरणों में है धीरज और संतोष गुरुजी ही मिटा सकते हैं हर दोष और मिटा कर भक्त की रूह पर लगा हर दाग गुरुजी अपनी कृपा से बनाते हैं रूह को पाक… और यूँ कर के रूह को तैयार वे ले जाते हैं इस भवसागर के पार रूह की मंजिल है जहाँ जहाँ है सचखंड का जहाँ।
गुरुजी ने थामी है तुम्हारे जीवन की डोर वे ले चल रहे हैं तुम्हें आंतरिक परिवर्तन की ओर ये ज़रूरी है धर्म की स्थापना के लिए वरना उज्जवल ना हो पायेंगे चेतना के दीये।
मन के महिषासुर का होना होगा नाश वरना निश्चित है विनाश गुरुजी आए हैं तुम्हें बचाने तुम्हें अपने सत्संग में बिठाने तुम्हारी आंतरिक चेतना बढ़ाने तुम्हें उस सामूहिक चेतना का हिस्सा बनाने जिसके द्वारा वे कर रहे हैं जग का कल्याण उसे भी तुम उनकी लीला लो मान।
जग में हो सकारात्मकता का सकाश जग में हो पवित्रीकरण और प्रीत का प्रकाश बहुत ज़रूरत है संवेदना और सम्भाव की ताकि समाप्ति हो आसुरी प्रभाव की।
है ये युग परिवर्तन की बेला हर कोई महसूस करने लग रहा है अकेला किंतु गुरुजी दिलाते हैं तुम्हें अपने सानिध्य का एहसास इसे महसूस करने के लिए उनसे जोड़ो अपने श्वास अद्भुत हैं गुरुजी के कल्याण करने के अंदाज़ तुम अपनी ओर से करो उनकी याद में रहने का प्रयास।
फिर कभी अकेला ना महसूस करोगे ना ही आसुरी प्रभाव से डरोगे गुरुजी सूर्य हैं तो तुम हो उनकी किरण गुरुजी से ही है तुम्हारा अस्तित्व और जन्म मरण और जैसे किरण सदा तैयार रहती है सूर्य में समाने के लिए वैसे ही तुम भी करो स्वयं को तैयार गुरुजी में खो जाने के लिए।
ना जाने मंजिल पास है या है दूर पर तेरे भीतर और बाहर है गुरुजी का नूर तू ये याद रखना ज़रूर और जीता चल तू जैसे हो जीवन का दस्तूर।
गुरुजी के नूर में है उन सदाशिव की ऊर्जा गुरुजी महाराज जानकर तू करता है जिनकी पूजा तुझे ज्ञात है कि गुरुजी का दर है हर दर से ऊँचा और गुरुजी जानते हैं की तुझे उनके सिवा सूझता नहीं कोई दूजा।
वे ही बख्शनहार हैं वे ही किरपाधार हैं वे ही तारनहार हैं तेरे प्राणों के आधार हैं।
देख लिए तूने दुनियावी रिश्ते नाते जो मौसम के जैसे हैं आते जाते गुरुजी के नूर की सनातन ऊर्जा में खो जा बस, अब तू गुरुजी का ही हो जा।
बहुत हुआ अब मन का भटकना बहुत हुआ अब सोच का उलझना अब गुरु का नूर करे तेरा संशय दूर तू गुरुमई है, तू नहीं मजबूर।
घर परिवार ये संसार प्रतिष्ठा, प्रभुत्व जीवन के कर्तव्य रोटी, कपड़ा, मकान इनका मोह कर देता है परेशान जब लेते हैं सांसें आख़िरी जब यहाँ से जाने की आती है बारी।
ना चाहते हुए भी हो जाती है इनमें आसक्ति ख़ुद के लिए नामुमकिन कर देते हैं मुक्ति गुरुजी महाराज ही दे सकते हैं वह शक्ति जिस से सीख जायें अनासक्ति की युक्ति।
वरना यहाँ आना जाना रहेगा जारी ना जाने कितनी बारी कर के किस किस देह पर सवारी देह का भार उठायेगी रूह बेचारी।
गुरुजी महाराज करें रहम तो ही कटेंगे सभी करम तो ही निभा पायेंगे इस तरह से इंसानी धरम कि संपन्न हो जाये जन्म मरण।
रूह को अज्ञात भविष्य का भी रहता है भय इसमें नहीं है कोई संशय इन सबका है एकमात्र उपाय कि गुरुजी को सर्वसमर्पण कर दिया जाये।
कहना आसान, करना कठिन ना हो पाये ये गुरुजी की दया बिन और जो वे हो जायें मेहरबान और मिल जाये उनकी दया का दान तो दूर हो जाएगा सारा अज्ञान और रूह को हमारे जीते जी मिल जाएगा आराम।
मत पत का राखा आप जी मत पत बख्शो गुरु महाराज जी आप ही मेरे सरताज जी आप ही संवारो मेरे काज जी।
आपके भरोसे हैं मेरे श्वास सारे मेरा तो जीवन है आपके सहारे आपके चलाने से मैं चलती हूँ आपके आँचल में मैं पलती हूँ मेरा तो आसरा हैं आप जी आप ही संवारो मेरे काज जी।
आपसे ही रक्षा मेरे परिवार की आपसे सुरक्षा मेरे संसार की आपने ही तो मुझे संभाला है आपका हर ढंग ही निराला है मेरे तो प्यारे रक्षक आप जी आप ही संवारो मेरे काज जी।
आपके आशीष से झोली भरती हूँ शुक्राना आपका मैं करती हूँ आपकी याद में मैं जीती हूँ आपका नाम अमृत पीती हूँ मुझपर सदा रहे आपका राज जी आप ही संवारो मेरे काज जी।
मत पत का राखा आप जी मत पत बख्शो गुरु महाराज जी आप ही मेरे सरताज जी आप ही संवारो मेरे काज जी।
रूह को मिला नक़ाब जो बन गया शरीर कर्मों की खुली किताब जो बन गई तक़दीर फिर कर्मों का हुआ हिसाब तो बनी जीवन की तस्वीर ये रूहानी सफ़र है जनाब ज़रूरी है संभाल कर रखना अपना ज़मीर।
रूह से रूह का नाता है हर भक्त का गुरुजी के संग जितना गहरा ये नाता, उतना गहरा होगा भक्ति का रंग दुनिया के मेले में रंग हैं बेशुमार पर भक्ति के रंग के समक्ष वे सब हैं बेकार।
दुनियावी रंगों में चल तो जाएगी ज़िंदगानी पर ज़रूरी है ख़ुद पर चढ़ाना रंग रूहानी और गुरुजी की भक्ति में मिलता है इसका शुभ अवसर जैसे जैसे उनकी शरण में गुज़रता है ये सफ़र।
इक दिन इस जीवन की तस्वीर की उम्र हो जाएगी पूरी कहीं कर्मों की अदाकारी ना रह जाए अधूरी वरना रूह को ओढ़ने पड़ेंगे ना जाने और कितने नक़ाब पूरा करने कर्मों का हिसाब जिसके बीच और हिसाब जुड़ते जायेंगे ना जाने फिर परमात्मा से कब मिल पायेंगे?
तोड़ कर क़ैद करने वाली हर ज़ंजीर जान और मान कर ख़ुद को इक फ़क़ीर सीखना होगा रूहानियत का ढंग अपना कर भक्ति का रंग।
बहुत दे लिया ख़ुद को धोखा अब गुरुजी ने दिया है मौक़ा गुरुजी महाराज हैं हमारे अंग संग जीवन की तस्वीर में हम भरें भक्ति के मंगलमयी रंग।
आए ना गुरुजी का बुलावा अगर तो कोई नहीं पहुँच सकता उनके दर पर आई गुरुजी की आवाज़ रूहानी तो उनके दर पर पहुँची ये निमानी।
गुरुजी के बुलावे में थी वह शक्ति कि मन ही मन में उपजी उनके प्रति भक्ति गुरुजी की आवाज़ में था वह प्यार कि उनकी कृपा से जुड़ी उनसे रूहानी तार।
करूँ उनका शुक्र बेशक उम्र भर रह जाएगी निश्चय ही कसर क्यूँकि गुरुजी की रहमतें हैं बेहिसाब जब कि गुनाहों से भरी है मेरे कर्मों की किताब।
गुरुजी हैं दया के सिंधु शिवालय है उनका दर अखंड हैं, अनंत हैं वे करुणालय हैं वे हर।
इच्छा है उन्हें प्राप्त करने की उनकी छवि से अपने अस्तित्व को यूँ भरने की कि मैं ख़ुद मैं रहूँ ही ना उनसे प्रेम हो जाये इतना घना कि संसार में रहते हुए रहूँ संसार से जुदा यूँ समा लें मुझे अपने में मेरे खुदा।
अपनी रूह की गहराई की ओर दिए हो चल वैसे नहीं रहे हो जैसे तुम थे कल पुराने दबे हुए घाव उभर कर बाहर आते जा रहे हैं यूँ ही नहीं अक्सर आँसू बहे हैं भीतर और बाहर के तूफ़ान से तुम ना डरो प्रत्येक तूफ़ान को गुरुजी के चरणों में समर्पित करो।
वे मार्गदर्शन करेंगे तुम्हारा बनकर तुम्हारा अखंड सहारा आ रहा है तुम्हारे जीवन में परिवर्तन तुम्हें आगे बढ़ाने के लिए व्याकुल हो रहा है तुम्हारा मन आज़ाद हो पाने के लिए।
गुरुजी को याद करो उनका दिया हुआ जाप करो निखरेगी तुम्हारी भक्ति मिलेगी तुम्हें शक्ति हर घाव की पीड़ा को सहने की केवल गुरुजी से सब कहने की क्यूँकि तुम जान गए हो कि कोई नहीं यहाँ है अपना जिसे तुमने समझा था अपना, वो था माया रूपी सपना।
जो होता है बीमार उसे ही लेनी पड़ती है दवाई जिसका साथी बिछड़ जाता है उसे ही सहनी पड़ती है जुदाई।
जिसपर आती है मुश्किल उसे ही करना पड़ता है उसका सामना अक्सर रोशनी दिखती ही नहीं है अंधकार होता है इतना घना।
तुम्हें याद नहीं है पर तुम्हारी रूह ने किया था निश्चय कि जब वह यहाँ आएगी लेकर इस देह जा आश्रय तो ऊँचाई की ओर बढ़ेगी हर वह सीढ़ी चढ़ेगी जो ज़रूरी है उन्नति के वास्ते चाहे कठिन हों रास्ते।
इसके लिए आवश्यक है मन का पवित्रीकरण तन और रूह का भी हो शुद्धिकरण इसलिए जितना हो पाये गुरुजी का सिमरन उसके द्वारा संवारते चलो तुम जीवन।
शुक्र है गुरुजी का तुम पर पहरा है तुम्हारी ज़िंदगानी में तुम्हारे भीतर होता हुआ परिवर्तन हो रहा है गुरुजी की निगरानी में सकारात्मक रखो अपनी विचारधारा मिला है तुम्हें गुरुजी का सहारा गुरुजी ने तुम्हें बख़शा है अपने सिमरन का दान गुरुजी के सिमरन से होगा तुम्हारा कल्याण हिम्मत रखते हुए हर सीढ़ी चढ़ो रूहानी तरक्की की ओर बढ़ो।
गुरुजी को जाना और माना है रब गुरुजी पर छोड़ना होगा सब तब सफ़र लगने लगेगा पहले से आसान बेशक आते रहें जीवन में तूफ़ान।
ख़ुद में है ही नहीं वो काबिलियत कि हो पायें तन मन से स्वस्थ कि काट पायें अपने कर्म समस्त कि मिटा पायें अपनी हैसियत।
गुरुजी तो स्वयं हैं खुदा उनके लिए हम नहीं हैं उनसे जुदा उन्हें सर्वसमर्पण करने में है हमारा कल्याण फिर भी ये करने से क्या हमें रोक लेता है हमारा अभिमान? या फिर गुरुजी पर हमें विश्वास नहीं है पूरा? या फिर हमारा भक्ति भाव है अधूरा?
गुरुजी ने बुलाया है अपने दर पर ये है उनकी मेहर उन्हें सर्वसमर्पण ना करना होगी ग़फ़लत हमारी ओर से क्यूँकि केवल गुरुजी देख सकते हैं हमारी हर परेशानी को गौर से और कोई भी नहीं देख या जान सकता हमारी मजबूरी इसलिए गुरुजी को सर्वसनर्पण कर मिटानी होगी उनसे हर दूरी।
गुरुजी से किसी भी प्रकार की दूरी होगी जब तक गुरुजी की प्राप्ति नहीं हो सकती तब तक इसमें नहीं है तनिक भी शक इसलिए इसके लिए जाना होगा किसी भी हद तक बल्कि फिर हद के भी पार ताकि गुरुजी संग हो जायें एकाकार।