जो अंग संग रहता है जो दिल की सदा सुनता है वो आप हो गुरुजी बस आप ही गुरुजी।
जग आपके सहारे दिल आपको पुकारे बस आपको ही, आपको ही आपको गुरुजी जो साथ साथ चलता है राहें रोशन करता है वो आप हो गुरुजी बस आप ही गुरुजी।
आप ही तो तारते हो आप ही संवारते हो बस आप ही बस आप ही बस आप ही गुरुजी जो प्यार बहुत करता है जो झोली भी भरता है वो आप हो गुरुजी बस आप ही गुरुजी।
जो अंग संग रहता है जो दिल की सदा सुनता है वो आप हो गुरुजी बस आप ही गुरुजी।
सिमरन का दान दिया है सत्संग का दान दिया है बस आपने ही, आपने ही आपने गुरुजी जो बख़्शीशें देता है जो आसीसें देता है वो आप हो गुरुजी बस आप ही गुरुजी।
चाहे झूठे हैं या सच्चे सब आपके हैं बच्चे बस आपके ही आपके ही आपके गुरुजी जो क्षमादान देता है जो प्राणदान देता है वो आप हो गुरुजी बस आप ही गुरुजी।
ब्रह्मा विष्णु आप ही हैं महादेव भी आप ही हैं बस आप ही बस आप ही बस आप ही गुरुजी सृष्टि के करता धर्ता सबके ही दुखों के हरता वो आप हो गुरुजी बस आप ही गुरुजी।
जो अंग संग रहता है जो दिल की सदा सुनता है वो आप हो गुरुजी बस आप ही गुरुजी।
क्या सोच रहा है तू याद कर रहा है तू क्या गुरुजी को सब है पता तू उन्हें बेशक ना बता।
क्या है तेरा इरादा तू कौनसा वादा है निभाता तूने तोड़ा है कौनसा वादा गुरुजी जानें तुझसे भी ज़्यादा।
उनसे कुछ नहीं छिपा तेरी खूबी हो या हो तेरी खता किसी और को बेशक ना हो पता इसलिए इस ग़लत फ़हमी को तू मन से ले हटा कि तुझे कोई देख नहीं रहा क्यूँकि चाहे उन्होंने तुझे ना हो कहा पर तुझपर है उनकी नज़र हर कदम और हर मोड़ पर और यही तेरे लिए अच्छा है क्यूंकि तू असल में अभी भी बच्चा है और वे तेरे माई बाप जो अपने आप करते हैं तेरी रक्षा देते हैं पूरी सुरक्षा।
हर सोच और हर कार्य उनके चरणों में कर ले अर्पित वे तेरे सबसे बड़े शुभचिंतक हैं, सदा करेंगे तेरा हित करते हुए शुक्राना और फ़रियाद तू करता चल उन्हें याद बेशक मीठा या कड़वा लागे गुरु प्रसाद उसमें है मंगलमई आशीर्वाद इसलिए उसे सादर ग्रहण कर और हर दर्द को सहन कर गुरुजी पर हो जा क़ुर्बान वे देंगे प्राणों का दान।
कई साल गए गुज़र यूँ चल रहा था राही का सफ़र कि उसे अकेला सा महसूस होता था भीड़ में भी अकेलेपन से रोता था लगता था उसे कि तमाशा है संसार लगता था उसे कि कहीं और है असल ख़ुशी का द्वार ना आता था उसे लोगों का व्यवहार समझ तो जाता था और भी उलझ।
फिर गुरुजी की कृपा हुई उसपर गुरुजी ने उसपर डाली अपनी मेहर-ए-नज़र क्यों उसे दुनिया वाले ना लगते थे अपने, गुरुजी ने उसे समझाया गुरुजी संग रूहानी तार जोड़कर उसने अपने सवालों का जवाब पाया।
ये जाना उसने ये माना उसने कि चाहे निस्वार्थ हो या स्वार्थी सभी की होती है अपनी ही कार्यावली प्यार सोच कर मोह जताया जाता है अक्सर दुनिया है बाज़ार और जाने अनजाने में भावनाओं का भी व्यापार होता है अक्सर वो भी था व्यापार जिसे राही समझ रहा था प्यार सोचा उसने की क्या ऐसा ही होता है संसार? जाना उसने की कोई बुरा नहीं, बस, सभी हैं अलग बाहरी आडंबर को ही कहते हैं जग।
राही गुरुजी संग तार जोड़ पाया गुरुजी ने उसे ऊँची अवस्था पर पहुँचाया जागृत होकर उसने लिया निर्णय इसलिए नहीं था कोई संशय फैसला किया सभी को मन से छोड़ देने का सभी से मोह के बंधन को तोड़ देने का।
केवल दूसरों से मुंह मोड़ने के लिए नहीं बल्कि स्वयं के भीतर लौटने के लिए अपनी चेतना से हुई दोबारा पहचान उसने चेतना को आखिरकार अपना लिया मान।
भीड़ में दूजों के साथ दिल मिलाने के बजाये उसने पा लिया था अपने भीतर गुरुजी से दिल मिलाने का उपाय जो दिल टूट जाता था बार बार दूजों के झूठ और नियंत्रण से उसी दिल ने हर कमज़ोरी कर ली पार सकारात्मक परिवर्तन से।
उसने बदली अपनी धारणाएं भी रूहानी उन्नति की ओर केंद्रित किए विचार सभी अब दबा ना पाता उसे दूजों का अभिमान गुरुजी की दया और कृपा से खिला उसका आत्मा-सम्मान।
नीवेंपन की नींव पर बनती चली इबादत की इमारत मोह छूटा तो छोटी दूजों के प्रति शिकायत राही ने छोड़ा दूजों को मनाना शुरू किया उसने अपनी बिगड़ी को बनाना।
जो राज़ी नही था रिश्ता निभाना सत्य के साथ उसके मन ने छोड़ दिया थामना उनका हाथ जितना हुआ दुनिया वालों के शोषण और उपयोग से दूर उतना ही उसके भीतर और चेहरे पर छाया गुरुजी का नूर।
इस नूर ने किया राही की राहों को उज्जवल गुरुजी की याद में रहने लगा वो हर पल उसे समझ आया कि उसे लगता था दूसरों के संग रहना ज़रूरी क्यूँकि उसकी स्वयं से थी बहुत ही बड़ी दूरी जैसे जैसे गुरुजी को चेतने लगा उसका चित्त वो दूरी गई मिट।
अब जो उसने निरंतर गुरुजी का सानिध्य पाया तो राही ने स्वयं को सम्पूर्ण पाया गुरुजी में अपने आप को खो कर गुरुजी, बस गुरुजी का हो कर।
मैं भी हूँ मुसाफ़िर, और मुसाफ़िर ही हो तुम हर मुसाफ़िर समय के चक्र में कभी ना कभी होता है गुम
पर सोचता है अक्सर या कभी कभी कि वो जानता है सभी और इस भ्रम में गुज़ारता है सफ़र फिर जब रास्ता नहीं आता नज़र
तो भटकने लगता है तड़पने लगता है जाता है जान अपना ही अज्ञान
और जब होती है अज्ञानता की पहचान तो फिर ढूँढने लगता है पथ और उस पथ पर अपनी पत
लेकिन देख पाता है केवल अंधकार और महसूस करता है लाचार।
और जिस मुसाफ़िर का सफ़र होता है गुरु के सहारे मुश्किल के बावजूद भी उसके हो जाते हैं वारे न्यारे गुरु की दिव्य ज्योत उस मुसाफ़िर के पथ का अंधकार करती है दूर और कर के उसके हर अहम और भ्रम को चूर उसे अवगत कराती है उसकी खामियों से
और वाक़िफ़ होते हुए उसकी परेशानियों से गुरु करते हैं मुसाफ़िर का मार्गदर्शन और कर के उसके अंतस का पवित्रीकरण बनाकर उसे पात्र अपनी कृपा और मेहरबानी का संवारते हैं रूप उसकी ज़िंदगानी की कहानी का।
शुक्र है तुम और मैं हैं गुरुजी महाराज की शरण में भाग्यशाली हम जो उन्होंने बुलाया अपने चरण में उनसे है ये विनम्र अरदास की सदा रखें हमें अपने पास अपनी रहमत से हमें अपनी कृपा का पात्र बनायें और सभी पर सदा अपनी दयादृष्टि बरसायें।
होना भी अगर चाहो तुम तो हो नहीं सकते किसी के अपने और कोई भी तुम्हारा अपना है ऐसे ख़याल हैं महज़ कुछ सपने।
हकीकत है ये, मान लो तो है अच्छा इक रिश्ते के अलावा कोई रिश्ता नहीं है सच्चा सुच्चा वो रिश्ता है गुरुजी का तुम्हारे साथ इस रिश्ते में है वह बात… जो रूह को छू जाती है जो निर्मल सुकून लाती है रोम रोम में तुम्हारे… और बेशक खड़ी हों लाखों दीवारें गुरुजी देते हैं उन्हें तोड़ ताकि तुम सब कुछ छोड़ उनके ही हो जाते हो उनसे यूँ जुड़ जाते हो जैसे तरुवर से डाली और फूल… और बनकर उनके चरणों की धूल कर देते जो उन्हें स्वयं को अर्पण और उनकी ही याद में रहते हो हर क्षण।
ये गुरुजी की महर से ही होता है कि भक्त इतना उनमें खोता है कि संसार में रहते हुए भी फ़र्ज़ और कर्मों का भार सहते हुए भी उसका ध्यान होता है गुरुजी की ओर और गुरु चरण होते हैं उसकी आरम्भिक और अंतिम छोर।
जिसका गुरुजी की ओर मुख है वह जाने की गुरुजी के चरणों में हर सुख है गुरु चरणों में है धीरज और संतोष गुरुजी ही मिटा सकते हैं हर दोष और मिटा कर भक्त की रूह पर लगा हर दाग गुरुजी अपनी कृपा से बनाते हैं रूह को पाक… और यूँ कर के रूह को तैयार वे ले जाते हैं इस भवसागर के पार रूह की मंजिल है जहाँ जहाँ है सचखंड का जहाँ।
गुरुजी ने थामी है तुम्हारे जीवन की डोर वे ले चल रहे हैं तुम्हें आंतरिक परिवर्तन की ओर ये ज़रूरी है धर्म की स्थापना के लिए वरना उज्जवल ना हो पायेंगे चेतना के दीये।
मन के महिषासुर का होना होगा नाश वरना निश्चित है विनाश गुरुजी आए हैं तुम्हें बचाने तुम्हें अपने सत्संग में बिठाने तुम्हारी आंतरिक चेतना बढ़ाने तुम्हें उस सामूहिक चेतना का हिस्सा बनाने जिसके द्वारा वे कर रहे हैं जग का कल्याण उसे भी तुम उनकी लीला लो मान।
जग में हो सकारात्मकता का सकाश जग में हो पवित्रीकरण और प्रीत का प्रकाश बहुत ज़रूरत है संवेदना और सम्भाव की ताकि समाप्ति हो आसुरी प्रभाव की।
है ये युग परिवर्तन की बेला हर कोई महसूस करने लग रहा है अकेला किंतु गुरुजी दिलाते हैं तुम्हें अपने सानिध्य का एहसास इसे महसूस करने के लिए उनसे जोड़ो अपने श्वास अद्भुत हैं गुरुजी के कल्याण करने के अंदाज़ तुम अपनी ओर से करो उनकी याद में रहने का प्रयास।
फिर कभी अकेला ना महसूस करोगे ना ही आसुरी प्रभाव से डरोगे गुरुजी सूर्य हैं तो तुम हो उनकी किरण गुरुजी से ही है तुम्हारा अस्तित्व और जन्म मरण और जैसे किरण सदा तैयार रहती है सूर्य में समाने के लिए वैसे ही तुम भी करो स्वयं को तैयार गुरुजी में खो जाने के लिए।
ना जाने मंजिल पास है या है दूर पर तेरे भीतर और बाहर है गुरुजी का नूर तू ये याद रखना ज़रूर और जीता चल तू जैसे हो जीवन का दस्तूर।
गुरुजी के नूर में है उन सदाशिव की ऊर्जा गुरुजी महाराज जानकर तू करता है जिनकी पूजा तुझे ज्ञात है कि गुरुजी का दर है हर दर से ऊँचा और गुरुजी जानते हैं की तुझे उनके सिवा सूझता नहीं कोई दूजा।
वे ही बख्शनहार हैं वे ही किरपाधार हैं वे ही तारनहार हैं तेरे प्राणों के आधार हैं।
देख लिए तूने दुनियावी रिश्ते नाते जो मौसम के जैसे हैं आते जाते गुरुजी के नूर की सनातन ऊर्जा में खो जा बस, अब तू गुरुजी का ही हो जा।
बहुत हुआ अब मन का भटकना बहुत हुआ अब सोच का उलझना अब गुरु का नूर करे तेरा संशय दूर तू गुरुमई है, तू नहीं मजबूर।
घर परिवार ये संसार प्रतिष्ठा, प्रभुत्व जीवन के कर्तव्य रोटी, कपड़ा, मकान इनका मोह कर देता है परेशान जब लेते हैं सांसें आख़िरी जब यहाँ से जाने की आती है बारी।
ना चाहते हुए भी हो जाती है इनमें आसक्ति ख़ुद के लिए नामुमकिन कर देते हैं मुक्ति गुरुजी महाराज ही दे सकते हैं वह शक्ति जिस से सीख जायें अनासक्ति की युक्ति।
वरना यहाँ आना जाना रहेगा जारी ना जाने कितनी बारी कर के किस किस देह पर सवारी देह का भार उठायेगी रूह बेचारी।
गुरुजी महाराज करें रहम तो ही कटेंगे सभी करम तो ही निभा पायेंगे इस तरह से इंसानी धरम कि संपन्न हो जाये जन्म मरण।
रूह को अज्ञात भविष्य का भी रहता है भय इसमें नहीं है कोई संशय इन सबका है एकमात्र उपाय कि गुरुजी को सर्वसमर्पण कर दिया जाये।
कहना आसान, करना कठिन ना हो पाये ये गुरुजी की दया बिन और जो वे हो जायें मेहरबान और मिल जाये उनकी दया का दान तो दूर हो जाएगा सारा अज्ञान और रूह को हमारे जीते जी मिल जाएगा आराम।
मत पत का राखा आप जी मत पत बख्शो गुरु महाराज जी आप ही मेरे सरताज जी आप ही संवारो मेरे काज जी।
आपके भरोसे हैं मेरे श्वास सारे मेरा तो जीवन है आपके सहारे आपके चलाने से मैं चलती हूँ आपके आँचल में मैं पलती हूँ मेरा तो आसरा हैं आप जी आप ही संवारो मेरे काज जी।
आपसे ही रक्षा मेरे परिवार की आपसे सुरक्षा मेरे संसार की आपने ही तो मुझे संभाला है आपका हर ढंग ही निराला है मेरे तो प्यारे रक्षक आप जी आप ही संवारो मेरे काज जी।
आपके आशीष से झोली भरती हूँ शुक्राना आपका मैं करती हूँ आपकी याद में मैं जीती हूँ आपका नाम अमृत पीती हूँ मुझपर सदा रहे आपका राज जी आप ही संवारो मेरे काज जी।
मत पत का राखा आप जी मत पत बख्शो गुरु महाराज जी आप ही मेरे सरताज जी आप ही संवारो मेरे काज जी।