आपके प्रेम में डूब कर मैं तरती रहूँ आपकी कृपा से आपकी सेवा करती रहूँ आपकी बख़्शी सुमत से संवरती रहूँ आपके हुक्म पर अमल करती रहूँ।
आपकी छवि की छाओं में निखरती रहूँ आपके ध्यान की धूप में आपको सिमरती रहूँ आपके चिंतन की चाँदनी में ख़ुद को भिगोती रहूँ आपकी करुणा की किरण से रोशन होती रहूँ।
आपकी प्रेरणा से सुधरती रहूँ आपकी याद की गलियों से गुज़रती रहूँ आपके दिखाये रास्ते पर चलती रहूँ आपके रूहानी आँचल में पलती रहूँ।
आपके नाम को निरंतर जपती रहूँ आपके प्रति श्रद्धा भाव में पनपती रहूँ सोयी हूँ या हूँ जागी, बस, आप की ओर मुड़ी रहूँ आपके आशीर्वाद से सदा आपसे जुड़ी रहूँ।
ये दुनिया है सराये ना अपने रहेंगे, ना रहेंगे पराये बदलता रहेगा सब गुरुजी जानें कैसे और कब।
ना घर रहेगा, ना रहेगा पैसा या सोना मिट्टी से आए सब, मिट्टी में होगा खोना देह भी बन जाएगी राख की ढेरी बस, रह जाएगी रूह तेरी और मेरी।
रूह पर भार ना डालें प्रतिकूल करम का वरना सिलसिला चलता रहेगा जनम मरण का ओढ़ना होगा कपड़ा शरीर रूपी आवरण का… इसलिए मिला है जो सहारा गुरुजी के चरण का तो भीतर को गुरुजी के ख़यालों से आबाद कर गुज़ारें उनकी शरण में ये सफ़र।
गुरुजी के नाम की चूनर को ओढ़ कर जैसे जैसे आगे बढ़ेगा ये सफ़र होता जाएगा ऐसा असर कि रूह जाएगी निखर।
कहेगा रूह पर चढ़ा नूर कि गुरुजी की दया नहीं है दूर हर रूह है उन्ही परमात्मा का हसीन हिस्सा उन्ही से शुरू उन्ही पर खत्म होता है हर रूह का किस्सा।
भोग भोगते भोगते तृष्णा ना बढ़ती जाये इसके लिए सिमरन है श्रेष्ठ उपाय जो गुरुजी ने है बख़्शा करने के लिए हमारी रक्षा ताकि हम फँसते ना जायें प्रपंच में दुनिया के रंग मंच में।
वरना कमी नहीं आकर्षणों की कमी नहीं विकर्षणों की इस संसार में घर परिवार में।
सिमरन मनोबल बढ़ाये सिमरन ध्यान की ओर ले जाये सिमरन मन की शुद्धि करे सिमरन विवेक की वृद्धि करे।
रूह की पावन वृत्ति यही है सिमरन की रीति गुरुजी को याद कर के उनकी याद से अंतस को भर के दूर होते रहें दोष मिले सम्पूर्ण संतोष तो तृष्णा को ना मिलेगा स्थान भीतर होने का विराजमान।
भोग से योग की स्थिति में प्रवेश करना होगा आसान क्यूँकि भीतर निरंतर होगा गुरुजी का सिमरन और ध्यान।
पूरण गुरु हैं गुरुजी महाराज ले जाने आए हैं भक्तों को ऊर्ध्वगति की ओर हाथ से ना जाने देना ये सुनहरा अवसर इस माजरे पर ज़रा फ़रमाना गौर।
ओम में गुरुजी रोम रोम में गुरुजी घर परिवार में गुरुजी संसार में गुरुजी रूहानी तार में गुरुजी हर पल गुरुजी अंग संग रहें।
सुख में गुरुजी, दुख में गुरुजी मन में गुरुजी, मुख पर गुरुजी भीतर बाहर के हर रूख में गुरुजी बस गुरुजी ही गुरुजी रहें।
जैसी भी हो मन की स्थिति जैसी भी हो परिस्थिति जो भी हो बात या तिथि बस “शुक्राना गुरुजी” ही कहें।
गुरुजी से ही श्वास भीतर हो गुरुजी का वास तो निर्मल हो निवास मिटता रहे हर त्रास गुरुजी महसूस हों पास फिर क्यों दिल हो उदास सदा हो खुशी का एहसास सिमरन की लगी रहे प्यास जीवन हो कितना खास बनकर गुरुजी का दास।
ऐसा हो जाये जो जीवन तो प्राप्त हो अविनाशी धन गुरुजी महाराज के सानिध्य का निरंतर गुरुजी के दर की सेवा पाकर।
गुरुजी की कृपा से बनें ऐसे धनवान तो चूर हो जाये झूठा अभिमान गुरुजी के चरणों में मिले जो स्थान तो असर कैसे किया जाये बयान जिसका तन, मन, रूह हो गुरुजी के चरणों तले उसके सिर पर स्वयं अपना हाथ रखें करुणानिधान।
गुरुजी का नाम जिस जिसने लिया उनका नाम अमृत जिस जिसने पिया गुरुजी का आशीर्वाद पाकर जो जिया उसका तो नसीब खिल गया।
गुरुजी का नाम है अमृत गुरुजी का नाम है औषधि गुरुजी का नाम है पावन गुरुजी के नाम को नमन इक बार नहीं, बल्कि बारम्बार क्यूँकि गुरुजी का नाम देता है तार करता है जपने वाले का बेड़ा पार करता है भीतर के असुर पर वार…
और भीतर के मल को हटाकर अंतस् के अँधेरे को मिटाकर भीतर भर देता है ऐसा प्रकाश कि हर संशय का होता है विनाश…
गुरुजी का नाम है शिव का नाम ये है तीरथ का धाम गुरुजी की नदर लाती है असर उनके नाम से टूटने लगते हैं पाश फिर तो क्या ज़मीं और क्या आकाश चेतना भरती है उड़ान अनंत की ओर थामे हुए इसी नाम की डोर हर बंधन के पार बनाकर नाम को आधार।
गुरुजी का नाम लाए रूह पर भी निखार यही है हर विस्तार का सार रूह ही है अविनाशी और अमर दरअसल ये है रूह का ही सफ़र जो नाम से हो शुरू और नाम पर ही हो मुकम्मल यही सत्य है आज, यही सत्य था कल और इसी सत्य से सजेगा आने वाला कल।
जो हमारे मन की स्थिति जानें बिन बोले हमारे सिर कैसे ना झुके उनके द्वारे? वे तो हमसे ज़्यादा जानते हैं हमें इसलिए क्यों ना दें उन्हें अधिक से अधिक समय?
कुछ ऐसा ही है जीवन कि आते जाते रहेंगे विकर्षण अनिवार्य है गुरुजी का हमारे प्रति आकर्षण जिसके लिए हमारा प्रयास ज़रूरी है हर क्षण।
कर्मकांड से नहीं, ना ही अंधविश्वास से परंतु हमारी श्रद्धा और विश्वास से निरंतर रहकर गुरुजी की याद में तृप्त रहकर गुरु प्रसाद में रहकर उनके प्रति शुकराना की भावना में ना कि सदा किसी माँग की पूर्ति की कामना में।
क्षमा याचना से प्रेम पूर्ण प्रार्थना से करते रहना होगा प्रयास अगर है गुरुजी को पाने की आस।
गुरुजी ही हैं शाश्वत संगी जिसकी जिंद्री उनकी याद में रहे रंगी उसका गुरुजी से मिलन होगा ज़रूर बड़े दयावान हैं वे हुज़ूर।
गुरुजी की प्राप्ति जो बन जाये जीने का मक़सद तो भक्त पार कर ले हर हद गुरुजी के सहारे सिर झुका कर उनके द्वारे।
भगवान के सामने कोई औक़ात नहीं इंसान की लेकिन जो हम संगत हैं गुरुजी करुणानिधान की उन्हें मिलता है गुरुजी महाराज से जो लाड और प्यार उसके योग्य भी नहीं, तो भी मिलता है वो बेशुमार।
ये गुरुजी महाराज की रहमत है है ये उन्ही की वड़ियायी हर पल कितनी संगत को बख़्शते हैं वे अपनी नदर और अपनी गुरूयायी।
है वो गुरुजी का प्यार जो करता है संगत का बेड़ा पार है वो गुरुजी की ममता जो देती है हर भक्त को क्षमता सदाशीलता की राह पर चलते रहने की गुरुजी के प्रेम में बहने की।
है वो गुरुजी की दी सुमत और चेतना जो भक्त को देती है आगे बढ़ने की प्रेरणा है वो गुरुजी की निर्मल नदर है वो उनकी मेहर-ए-नज़र जो सोए भाग्य जगाती है जो प्रारब्ध को कटवाती है।
ये सोचना है बहुत बड़ी नादानी कि हम चला रहे हैं अपनी ज़िंदगानी क्यूँकि अपनी स्वतंत्र इच्छा के अलावा कुछ और नहीं वश में हमारे ये तो हमारे गुरुजी का प्रताप है जिस से हैं हमारे वारे न्यारे।
इक श्वास पर भी चलता नहीं है हमारा ज़ोर इक पल ज़िंदा, तो क्या मालूम अगले पल टूटे साँसों की डोर और गुरुजी महाराज फ़रमाते हैं हमारी छोटी से छोटी बात पर भी ग़ौर फिर क्यों जाना ऐसे गुरु को छोड़ कर कहीं भी और?
गुरुजी गुरु भी हैं भगवान भी न्यायाधीश भी और करुणानिधान भी उनके कमल चरण में निश्चित है सुरक्षा भी, और सम्पूर्ण कल्याण भी।
असफलता तुम्हे ना सकेगी तोड़ अगर सच्चे मन से चल पड़ोगे गुरुजी की ओर क्यूँकि गुरुजी तुम्हारी ओर सैंकड़ों कदम बढ़ायेंगे तुम्हें असफलता के पार लेकर जायेंगे।
हर शिकायत, हर इंकार दूर हो जाएगी स्वीकार करोगे तो ऐसी सकारात्मकता आएगी कि तुम्हें अपनी हार से बहुत कुछ सीखने को मिलेगा और एक नई चेतना का सुंदर फूल खिलेगा।
सीखना ना छोड़ना, ना छोड़ना प्रयास गुरुजी पर क़ायम रखना विश्वास सफ़र में जो भी पड़े सहना तुम आत्मा-बोध करते रहना।
तुम हो खुशनसीब सफलता है क़रीब हर अनुभव से सीखते चलो तुम ना होना दुनियादारी में गुम।
बेशक है कलयुग का कोलाहल पर तुम्हारे कष्ट रहे हैं टल क्यूँकि गुरुजी महाराज कृपा रहे हैं कर इसलिए उनके शुक्राना में जोड़ लो अपने कर और हर पल, हर पहर गुरुजी को याद कर उनकी मेहर का उन्हें धन्यवाद कर जारी रखो अपना सफ़र सब गुरुजी पर छोड़ कर रंग लाएगी गुरुजी की मेहर बीच मजधार से पहुँचोगे किनारे पर।
चल रहा था मुसाफ़िर होकर बेख़बर कि उसे कोई मिलेगा और उसका नसीब खिलेगा।
उसके जीवन में था इक ख़ालीपन किसी को ढूँढता था उसका मन पर वो ना पाता था समझ जितना सोचता था, जाता था उतना ही उलझ।
गुज़रता रहा समय अब उसे होने लगा संशय कि कौन है वो जो है इतना शक्तिमान जिसके लिए उसका मन हो रहा है यूँ परेशान?
मुसाफ़िर महसूस कर रहा था स्वयं को गुमराह मिल नहीं रही थी उसे सुलझन वाली कोई राह फिर उसे सम्भालने आए शहंशाहों के शहंशाह और मुसाफ़िर के मन में ना रही बाक़ी कोई और चाह।
बैठा था वह इक रात इक जलाशय के किनारे नाकामयाबी से गिनते हुए आसमान में तारे हवा चल रही थी मंद मंद उसकी आँखें होने लगीं बंद तभी किसी ने उसका सिर छुआ मुसाफ़िर को बहुत आश्चर्य हुआ।
उसकी आँखों से उसी पल बहने लगे आँसू उसे लगा कि उस अनजान व्यक्ति ने छू ली उसकी रूह उसके हाथ जुड़ गए नमस्कार में उसे लगा दर्शन दिए हैं पर्वरदिगार ने।
सही था उसका ये अनुमान क्यूँकि उसके समक्ष खड़े थे भगवान गुरुजी महाराज के रूप में वे लग रहे थे शहंशाह पराक्रमी मुसाफिर चुप था, लेकिन बोल रही थी उसकी आँखों की नमी।
ये सब सपना है, मुसाफ़िर को लगा फिर उसे लगा कि वह नींद से जगा बिन किसी के कुछ बोले हुआ दोनों के बीच वार्तालाप मुसाफ़िर को लगा कि धुल गए उसके कई जन्मों के पाप।
“कौन हैं आप, जो लागें मुझे इतने महान और शक्तिमान?” “आपके दर्शन पाकर तो होने लगा है मेरा कल्याण।” कहा मुसाफ़िर ने गुरुजी महाराज से बहुत प्यार से “मैं धन्य हो गया आपके दीदार से।”
गुरुजी महाराज ने स्वयं में मुसाफ़िर को अनेकों देवी देवता के कराये दर्शन मुसाफ़िर अनुग्रह से झुकता गया और छू लिए उसने गुरुजी महाराज के चरण।
गुरुजी महाराज हुए अंतर्धान मुसाफ़िर अब नहीं था परेशान गुरुजी की महिमा से हुई थी उसकी पहचान उसने उन्हें अपना आराध्य लिया मान।
गुरुजी की याद से रहा उसका मन आबाद उसे बड़े मंदिर जाने का मौका मिला बरसों बाद उसे पहली बार मिला गुरुजी का चाय प्रसाद और लंगर प्रसाद उसने किया गुरुजी का तहे दिल से धन्यवाद।
गुरुजी मुसाफ़िर पर करते रहे नदर बिन संशय, बिन उलझन के बीता उसका सफ़र मुसाफ़िर ने गुरुजी के आशीष के महत्व को जान उनसे अर्ज़ी की कि वे करें सभी का कल्याण।
गुरुजी की याद में रहकर ख़ुद को सम्भालें वरना शांत ना हो पायेगा मन बढ़ती जाएगी उलझन।
गुरुजी की याद में रहकर स्थिर होने लगेगा मन मिलने लगेगी सुलझन सहज होने लगेगा जीवन।
सहजता और सादगी होगी जीवन में स्थिरता और शांति होगी मन में बढ़ौती होगी रूहानी धन में तो आनंद की उमंग होगी हर क्षण में।
युग परिवर्तन के समय में कुछ भी नहीं है गुरुजी की याद से ज़्यादा सुखदायी अनंत है उनके नाम के महासागर की गहराई जो इसमें डूब गया, वो पा लेगा खुदाई ऐसी है गुरुजी की वड़ियायी वे स्वयं हैं खुदा और उनकी आभा है खुदा का नूर गुरुजी से अरदास है कि वे कभी न करें अपने से दूर।